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संदेश

चाँद तारे

You...! Increasing and decreasing...!! Sometimes the moon shows dreams of stars...! When I close my eyes...! You...!! Covering the entire universe...! I live in you...! Or...!! You are in me...! Couldn't know this...!! I...till date...!!! When life slips out of my grasp...! Would sit on palm leaves...!! Then...!!! In the twilight...! You...!! His shadow grows longer...! Pulling...! Start a new life...! You...!! Would have taken over my entire existence...!!! I regularly...! Waiting for a new morning...! You are so mysterious...! Oh night...!! Are you like me?...???

secret road

मेरे घर के  पास हल्के अंधेरे से घिरा___एक रास्ता गुज़रता है। और घने जंगलों में  गुम होता हुआ।  सुबह होती है  शाम होती  है  शरीर के पिंजरे में  बंद मुझे घुटन सी होती है।  दिन होता है किसी अप्सरा के आइना की तरह सुंदर और साफ़  मगर रात_____होती है  किसी जादूगरनी की झाडू की तरह  भयावह।

Universe

तुम्हारे ही____ अनुगुंजि शब्दों  के  वाङ्मय में  तीनों गुणों से रहित मैं  तिरोहित हो गयी मैं  पूरी ब्रम्हाण्ड हो गयी।

I am not a rock

May be..... I born a loser. ..but I am not a rock or stone...I am a shelter.....if one day I lost my heart                            Can you loan me your's___ But. ....reminds it, I have never the habit of returning things....."

Fate

प्रेम...! प्रथम दृष्टि  में      ...! कितना मादक होता है..! दिखता है ज़मीन पर आसमान..!. असम्भव...सबकुछ  सम्भव लगता है....! और जब ....! वही मादकता और प्रेम आजीवन टीक जाए...! तब...! धन्य हो जाता है इंसान...!! सखी..!काश..!! ऐसा कुछ  सच होता...?? और..! प्रकृति और पुरूष के मौसम में..! इतनी विसंगतियाँ न होती...??

Fragrance of love

प्रेम...! प्रथम दृष्टि में...! कितना मादक होता है..! दिखता है ज़मीन पर आसमान..!. असम्भव...सबकुछ  सम्भव लगता है....! और जब ....! वही मादकता और प्रेम आजीवन टीक जाए...! तब...! धन्य हो जाता है इंसान...!! सखी..!काश..!! ऐसा कुछ  सच होता...?? और..! प्रकृति और पुरूष के मौसम में..! इतनी विसंगतियों  न होती...??

Fragrance of old house

पुराने घर की खुशबू हमारे बचपन की तरह ____ हमारा घर भी बहुत पीछे छूट जाता है_____ मगर उसकी खुशबू हमारे मन से कभी नहीं जाती. एक संत की तरह हमारा घर एकांतवासी हो जाता है. बरामदे में पडी कुरसियों जंगले से जर्रजर  गेट झाडियों से अटा बगिया______और कमरे की हाल मत पुछिये दिलबर__! माँ की लोरी अब भी गूँजती है हर दर दिवार. जिंदगी खींच ले जाती है हमें___घर से बहुत दूर हमारा घर बाट जोहता रहता है. दादी-दादी की आँखों का पानी सुख जाता है. झूखे पत्ते की तरह एक दिन___ वे जाते हैं झर. हमारे घर की दहलिज तब भी_____ जोहती है हमारी बाट कली रूठ- रूठ के खिल जाती है इस आश में कि___ घर की खुशबू एक दिन  हमें खींच लाएगी. और विडम्बना देखिये____ हम आते तो हैं मगर_____ घर की निलामी के लिए__!!"

अधुरे सवाल

कितने सवाल उठते हैं ____ मगर अधूरे____ मन की आशाएँ उतनी ही चंचल सागर में उठती जितनी लहरें। आकाश में जितने हैं उड़ते बादल नारी पूछ रही सदियों से एक सवाल कहाँ है मेरे पग तले की ज़मीन ? कभी कन्या, कभी भार्या बनकर ___ इतनी भरी धरतीी में मैं क्यों अस्तित्वहीन /

पहली कली

" ओ वसंत की पहली कली मन के बाग में जब तुम पहली बार खिली थी ओस से भीगी हुई तेरी पंखड़ियाँ छिटकी थी तब प्रकृति के आँचल में किसने लिखा था तेरा नाम ___गुलबहार।"  

अंत

 हर रास्ते का एक अंत होता है . जहां धरती खतम होती है वही से सागर का आरंभ होता है । मैं हर दिन एक सफर शुरू  करती हूँ और सागर की अनंत गहराइयां नापकर बाहर तो निकाल आती हूँ मगर एक शून्य से टकराने के बाद जो मेरे अंदर भी है और बाहर भी।                                                                                                                                  हजारों की भीड़ में जो मुझे अलग वन की राह पर ले आता है।