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संदेश

अधुरे सवाल

कितने सवाल उठते हैं ____ मगर अधूरे____ मन की आशाएँ उतनी ही चंचल सागर में उठती जितनी लहरें। आकाश में जितने हैं उड़ते बादल नारी पूछ रही सदियों से एक सवाल कहाँ है मेरे पग तले की ज़मीन ? कभी कन्या, कभी भार्या बनकर ___ इतनी भरी धरतीी में मैं क्यों अस्तित्वहीन /

पहली कली

" ओ वसंत की पहली कली मन के बाग में जब तुम पहली बार खिली थी ओस से भीगी हुई तेरी पंखड़ियाँ छिटकी थी तब प्रकृति के आँचल में किसने लिखा था तेरा नाम ___गुलबहार।"  

अंत

 हर रास्ते का एक अंत होता है . जहां धरती खतम होती है वही से सागर का आरंभ होता है । मैं हर दिन एक सफर शुरू  करती हूँ और सागर की अनंत गहराइयां नापकर बाहर तो निकाल आती हूँ मगर एक शून्य से टकराने के बाद जो मेरे अंदर भी है और बाहर भी।                                                                                                                                  हजारों की भीड़ में जो मुझे अलग वन की राह पर ले आता है।